આજ નો દિવસ : વિક્રમ સંવત   ૨૦૭૩  ( નેમિસૂરિ સંવત  ૬૮ )  આસો સુદ બીજ શુક્રવાર   Dt: 22-09-2017



જીવન માં જે વાત ભૂખ્યું પેટ અને ખાલી ખિસ્સું શીખવે છે, તે વાત કોઈ શિક્ષક પણ ના શીખવી શકે

प्रवचन-१

अनित्यानि शरीराणि वैभवो नैव शाश्वतः ।

नित्यं सन्निहितो मृत्युः कर्तव्यो धर्मसञ्चय ।।

अर्थ शरीर शनित्य है, वैभव कभी शाश्वत नहीं है, मृत्यु हंमेशा के लिए पास में है, अतः धर्म का संचय करना ही हमारे लिए परम कर्तव्य है ।

अनंतकाल से आज तक हमारे अनंत भव हो गये  । हमने हर भव में शरीर बदला, एड्रेज चेन्ज किया, और नये नये नाम पाये । परिवार में हर बार परिवर्तन हुआ, सब बार बार परिवर्तित किया । कलिकाल सर्वज्ञ श्री हेमचन्द्रसूरिजीने योगशास्त्र में कहा है कि 'समस्त लोकाकाशेऽपि नानारुपैः स्वकर्मीभः । वालाग्रमपि तन्नास्ति, यन्न स्पृष्टं शरीरिभिः ।।' यानि अपने कर्मो से पराधीन होकर जीवने अलग अलग रुप धारण करके पूरे चौदह राजलोक का एक बाल के अग्रभाग जितना भी स्थान ऐसा नहीं रखा कि जिसका स्पर्श नहीं किया हो । इस प्रकार बार बार भटकने पर भी हम कहीं भी सुखी नहीं हुए, संतोष नहीं मिला, अनुकूलता को छू नहीं सके, क्योंकि हमने सब में परिवर्तन किया, सिर्फ एक अपने स्वभाव में ही परिवर्तन नहीं किया । विषयो की आसक्ति, कषायों की परवशता, मोह-ममताकी ग्रंथी बांधनेकी जो अवर अनादि की चाल है, उसमें हमने तनीक भी बदलाव नहीं लाया । अतः भटकना चालू है । ख्याल रखो-

'जब तक स्वभाव नहीं बदलोगे तब तक इस संसार में हर चीज बदलनी पडेगी । कहीं भी स्थिरता नहीं मिलेगी । और सुख नहीं मिलेगा और जब हम अपना स्वभाव ही बदल देंगे तब हमे कुछ भी बदलने की जरुरत नहीं रहेगी ।'

अब हमें मानवभव पाकर यहीं कार्य करना है । सर्वजीववत्सल देवाधिदेव को, निर्गन्थ गुरुओंको, ऐसी सर्वजीव हितकारिणी क्रियाओंको, तथा अभ्युत्थान के एकमात्र साधनरुप धर्म को पाकर हमें सबसे पहले अपना स्वभाव बदलना है ।

आजतक कितने गुरुभगवंतो का समागम हुआ । उनके व्याख्यान भी सुनें । तर्क, युक्ति और दृष्टांत के त्रिवेणीसंगम से और लागणी से भरा हुआ उपदेश भी सुना । फिर भी आज तक हमारी हालत निंद्रावस्था में सोये रहने से कम नहीं है । कहते है 'कुंभकर्ण को इन्द्रासन पाना था । अतः शिवजी की कडी आराधना की । दूसरी और इन्द्र को भी आज के प्रधान की तरह अपनी कुर्सी छोडनी नहीं थी । इस कुर्सी को पाने की एवं इसे पकड रखने की अटकलबाजी पुराणकाल से चली आ रही है । इन्द्रने सरस्वती को अपने पक्ष में साध लिया । जब शिवजी ने प्रसन्न होकर कुंभकर्ण से वरदान मांगने के लिए कहा, तब कुंभकर्ण गफलत से इन्द्रासन के बजाय 'निंद्रासन' हीं मांग बेठा । शिवजी ने तथास्तु कह दिया । अलबत्ता, इन्द्र का सिंहासन बच गया । लेकिन कुंभकर्ण बडा निंद्रालु बन गया । कहते है कि बाद में जब भी काम पडने पर उसे उठाना होता तो बडी धमाल करनी पडती थी । ढोल-त्रासे जोर-जोर से बजाने तथा अन्य भी कई युक्तियों लडाने के बाद, छः छः महीने की मेहनत के बाद ही वह जागृत होता था । तब से निंद्रालु को कुंभकर्ण की उपमा दी जाती है । लेकिन अपनी हालत तो इससे भी कुछ निराली और भारी है । क्योंकि आजतक  कितने गुरुभगवंत आये और गये, कितना ही धर्म के बारे में सुना, भगवान की सुंदर भक्ति भी बार बार की, इतने सुंदर धर्मानुष्ठान भी प्रायः हर दिन करते रहें फिर भी आजतक का अपना जो पुराना स्वभाव था, पुरानी आदत थी वह ऐसी की ऐसी ही रही । इतने ढोल-त्रासे बजने पर भी आजतक हम सोते रहे हैं ।

भगवान पारसमणि जैसे है । पारसमणि के लिए कहा जाता है कि पारसमणि को लोहा छूता है तो लोहा सोना बन जाता है । यदि कोइ पारसमणि की परीक्षा के लिए और 'यह काच तो नहीं है ना' ऐसी शंका को मिटाने के लिए जोर से हथौडी का प्रहार करे, तो क्या होता है ? मालुम है ? पारसमणि को तो कुछ नहीं होता है, लेकिन वह लोहा सोना बन जाता है । पारसमणि यह ताककत है अपने पर प्रहार करनेवाले का भी कल्याण करना, लोहे में सें सोना बना देना । परमात्मा भी ऐसे हि है । देखिये उस शूलपाणी यक्षको जिसने भगवान को सारी रात परेशान किया । भयंकर उपद्रव किये । लेकिन इससे भगवान का क्या बिगडा ? कुछ नहीं । और शूलपाणी की सम्यक्त्वकी प्राप्ति हुई ।

डंसकर मार डालने की भावना रखनेवाले उस चंडकौशिक सर्प से भगवान का तो कुछ नहीं बिगडा, किन्तु उस सर्प को सम्यक्त्व और देवलोक मिल गया ।  कविने भी कहा 'साप चंडकोशियों, जे महारोसियो... पोषियो नयन सुधापुरे...' यानि महाक्रोधी सर्प को भी है भगवान । आपने आंखो में से अमृतधारा बहाकर पुष्ट किया-कल्याण किया ।

दस अच्छेरा में जिस का एक नंबर ऐसे-केवलज्ञान होने के बाद उपसर्ग करनेवाले गौशाले को भी आपने सम्यक्त्व का उपहार दे दिया ।

सुना था- एक बुड्ढी गरीबी से बाज आ गयी थी  । अंत में कुछ धन पाने हेतु घर में पडी हुई एक पुराने काल की तलवार लेकर दिल्ली के मैन बाजार में बेचने के विचार से वहां जाकर खडी रही । लोग भी बुड्ढी को तलवार बेंचती देखकर जिज्ञासावश उसके पास आकर तलवार देखते, लेकिन बिना धार की उस तलवार को व्यर्थ समझकर वापिस लौटा देते । इस प्रकार घण्टे दो घण्टे हो गये, कितने ही लोगों ने तलवार को देखा । फिर भी बुड्ढी का काम नहीं हुआ । उसी वक्त वहां से अकबर बादशाह गुजर रहे थे । वेभ ी वहां पर भीड देखकर बुड्ढी के पास आये । बादशाह सलामत को देखकर लोगों ने मार्ग दिया । और दूरसे तमाशा देखने लगे । बादशाहने बुड्ढी से पूछा - क्या कर रही हो ! बुड्ढीने कहा - गरीबी से हैरान होकर मेरे पति की एकमात्र याद रुप यह तलवार बेचने के लिए खडी हूं  । किन्तु मेरा भाग्य दो डग आगे ही है । कितने ही लोगों ने इसको देखी, लेकिन कोई खरीदनेवाला नहीं मिला । बादशाहने भी कुतुहलवश तलवार को देखने के लिए हाथ में ली । लेकिन बेकार की समझकर वापिस दे दी । तक तक में बुड्ढी भी जान गई थी कि 'ये बादशाह सलामत है ।' जब बादशाहने तलवार वापिस दी, तब वह बुड्ढी बार बार तलवार और बादशाह की और ताकने लगी । बादशाहने थोडी सी करडाकी के साथ पूछा- बार बार क्या देख रही हो ? क्या तुमको ऐसा लग रह है की मैने तलवार बदल दी ? क्या हम पर विश्वास नहीं है ? तब बुड्ढीने हिंमत से कहा- 'नहीं हुजूर ! बात ऐसी नहीं है । मैने सुना था की आप साक्षात पारसमणि है । लेकिन (अब) आपके हाथ हो छूने पर भी मेरी यह लोहे की तलवार सोने की क्यों नहीं बनी ? यह सोच रही हूं ।' झटका बराबर लगा । बादशाह समझ गये । और फौरन ही अपने सेवको को बुलाकर तलवार के वजन के बराबर सोना बुड्ढी को देने का आदेश दे दिया ।

कहने की बात यह है कि जब एक बादशाह भी पारसमणि का काम कर सकता है, तो तीनलोक के नाथ क्या पारसमणि नहीं हो  सकते ? जब शूलपाणी यक्ष, चंडकौशिक सर्प और गौशाले जैसे में भी परिवर्तन ला सके, तो हम तो भगवान के भक्त है । पूरे बहुमान के साथ भगवान को भेंटते है । श्रद्धा से पूजा-भक्ति करते है, फिर भी हम लोहे के लोहे ही रहें, ऐसा क्यो ? अपनें पुराने स्वभाव में कोई सुधार नहीं हो रहा है, इसके पीछे कारण क्या है ? कहां गडबड है ? हमें ढुंढना पडेगा ! इस अति दुर्लभ मानव भव को ऐसे व्यर्थ तो जाने नहीं देना है । अनुभविओं का कहना है कि यदि लोहे और पारसमणि के बीच कपडे का भी परदा हो, तो पारसमणि को छूने पर लोहा सोना नहीं बनता तथा जंग लगा हुआ लोहा भी सोना नहीं बनता है । क्या हमारे लिए भी यही बात है? यदि हमने अपने और परमात्मा के बीज अहंकार की बारीक सी भी दिवार खडी कर दी, यदि अपने व्यक्तित्वको परमात्मा के व्यक्तित्व में लीन बनाने के बजाय हमने अलग ही रखा, यदि हमने परमात्मा के चरणो का दास बनने जितनी भी नम्रता नहीं है, जब भगवान के पास जाते है, या जब भगवान याद आते है, तब अगर हम अपने आप को परमात्मा से एकरुप होते हुए देखकर अपने स्वतंत्र अस्तित्व को याद रखते है, तो हम अहंकार के चक्करमें फंसे है, परमात्मा तो पारसमणि ही है, लेकिन हम लोहे रुप होने पर भी अहंकार के परदे के बीच में रखकर उनको छूते है । तो अब भला लोहा सोना कैसा बनेगा । तो दूसरी और विषयो की आसक्ति का जंग हम पर बूरी तरह से छाया हुआ है । विषयो के संपर्क ने पानी का काम करके अपने इस लोहे को पूरी तरह से जंगयुक्त बना दिया है । हमे यह जंग निकालना नहीं है और सोना बनना है, तो यह कैसे हो सकेगा ? असंभव है

समझ लो, ऐसा लोहा और पारसमणि का संग दुर्लभ है, पशु के भव में लोहे जैसा शरीर जरुर मिला था लेकिन पारसमणि तुल्य भगवान नहीं मिले, तो देव के भव में भगवान रुप पारसमणि मिले ही होंगे, भगवान के जन्म महोत्सव मेें हम गये होंगे, समवसरण में देशना भी सुनी होगी, शाश्वत मंदिरो में भगवान की भक्ति भी की होगी । लेकिन धर्म सुनने एवं समझने पर भी वहां धर्मपालन के लिए समर्थ शरीर नहीं मिला । वहां पारसमणि जरुर मिला किन्तु लोहा नहीं मिला । और सोना प्राप्त नहीं कर सके । यह मनुष्यभव ही ऐसा है, जहां हमे दोनो मिले है, पारसमणि और लोहा । हमारा औदारिक शरीर देवो के शरीर की तरह सुंदर भले ही न नहीं, लेकिन धर्मआचरण में समर्थ तो जरुर है ।

एक स्टेट के महाराजा को अपने शरीर की काफी चिंता थी शरीर को सदा युवान रखने के लिए महाराजा हररोज डॊकटर से महंगा इंजेक्शन लिया करते थे, किन्तु धन और वेश्या की तरह शरीर भी कभी किसी का कहां रहा है । शुरु शुरु में स्फूर्ति ताजगी और ताकत देनेवाले उसी इंजेकशन का ही रीएक्शन होने लगा । शनैः शनैः इंजेक्शन शरीर ने लिए जहर साबित हुआ । सारा शरीर भयंकर रोग से ग्रस्त हो गया । बदन से निकलती बदबू इतनी तीव्र थी की कोई भी आदमी क्षणभर भी उनके पास खडा तक नहीं रह सकता था । अंत में बेचारे उन महाराज को कोने के एक कमरे में रखा गया । डॊकटरो को छोडकर कोई भी व्यक्ति-परिवार तक का भी उनके पास जाने के लिए तैयार नहीं था । डॊकटर भी मुखकोश बांधकर ही जाता था और ऐसी ही हालत में उनकी मौत हुई ।

शरीर के लिए कितना भी सहन करो, बरदास्त करो, उसका स्वभाव ही नाश होने का है, अतः उत्तराध्ययन सूत्र में भी कहा है- 'घोरा मुहुत्ता, अबलं शरीरं' आनेवाली हर एक पल- भविष्य का एक एक क्षण भयंकर साबित हो सकता है, और अपना शरीर काल के मारो सहन करने में समर्थ नहीं है । याद रखो- आनेवाली पल अपने मोत की भी हो सकती है, - आनेवाला समय अकलमंद ऐसे हमको पागल बनानेवाला भी हो सकता है, - आनेवाली घडी हमें अंधा या बहरा बनानेवाली भी हो सकती है । - आनेवाला भविष्य वर्तमान में सतत दौडते रहनेवाले हमको ऐसे पैरेलेसीस (लकवा) का शिकार बना दे हम बिछौने में से उठने में भी समर्थ न रहे । आनेवाली कल इतनी भयानक हो सकती है, कि हमे करोडपति में से रोडपति बना दे । - अनेकोंका पेट भरनेवाले को भी 'पेट कैसे भरना? कि चिन्ता में डूबा दे ।

यह कोई भयभीत करने के लिए की गई कल्पना नहीं है । यदि इतिहास के पृष्ठ पर दृष्टि रखो तो मालुम पडेगा कि यह कितना कठोर सत्य है । देखिये - तीन खंड के वासुदेव लक्ष्मण आनंद में अपने महल के ऋरुखे में बैठकर अपनो अयोध्या नगरी की शोभा देख रहे थे । रावण जैसे महारथी को परास्त करनेवाले लक्ष्मण को उस वक्त चुनौती देने का सामर्थ्य भी किसी में नहीं था । और लक्ष्मण के दिमाग में भी अपने मौत की कोई कल्पना नहीं थी । पर काल भयंकर है । आकाश में भविष्य में कब सूर्यग्रहण होगा यह कहनेवाला बेचारा स्वयंका कब यमग्रहण होगा बता नहीं सकता । ऐसा हुआ । इन्द्रसभा में राम-लक्ष्मण के परस्पर प्रेम की प्रशंसा खुद इन्द्र ने की । तब मन में विश्वास नहीं होने से दो देव मानव का रुप लेकर पृथ्वी पर आये । इन्द्रजाल से राम के मौत का दृश्य खडा किया । और आनंद में बैठे लक्ष्मण को राम के मौत का समाचार दिया । तब रे ! क्या मेरा भाई राम मर गया ! ऐसे विचार का झटका लक्ष्मणजी को ऐसा लगा कि वहां ही वहां हार्टफैल से चल बसे । विशेषावश्यकभाष्य में आयुष्यका धागा समय से पहले टूट जाने में सात कारण दिखाये है । उनमें अतिराग, अतिद्वेष, अतिहर्ष और अतिशौक मुख्य है । लक्ष्मणजी के मौत का कारण अतिरागजन्य अतिशौक था । अतिहर्ष भी मौत का कारण बन सकता है । एक दीन पढा था ।

एक मजदूर को लाख रुपये की लौटरी लगी । मजदूर को रखर नहीं पडी, वह तो हर रोज की तरह ही मजदूरी करने चला गया था । उसकी पत्नी सोचने लगी । यदि मेरे पति को सीधे ऐसे समाचार मिले तो हो सकता है, हर्ष के अतिरेक में कही पागल न बन जाय । अतः कुछ उपाय से काम लेना चाहिए । ऐसा सोचकर उपाय के लिए पास में ही रहनेवाले पादरी को बुलाया, सब बात बता दी और कोई युक्ति निकालने की विनंती की । पादरी ने सान्तवना दी, और शाम को जब वह मजदूर घर पर लौटे तब अपने पास भेजने की सूचना दी । शाम को मजदूर ६ रुपये मजदूरी करके घर पे वापिस आया । पप्नी ने पादरी के पास भेजा । पादरी ने आरंभ से सब इधर-उधर की बाते की । बाद में धीरे से पूछा- 'क्या लौटरी खरीदते हो ।' मजदूर ने कहा इतना पैसा ही कहां बचता है कि में लौटरी खरीदने का शौक करुं । फिर कुछ दिन पहले मैं ने पांच रुपये का नोट छुटा कराने के लिए एक टिकिट खरीदा था, लेकिन आपको क्यों पूछना पडा ?' पादरी ने कहा वैसे बात तो कुछ नहीं है, लेकिन समझ ले यदि तुझे लोटरी में १०रु. मिला तो क्या करेगा ? मजदूरने कहा 'मुझे ऐसा सोचने की फुर्सत ही कहां है?' 'नहीं नहीं ! फिर भी तूं बता तो सही !' पादरी ने आग्रह किया । 'एकबार होटल में खाने की ईच्छा है, रु.१००, लगे तो?' 'साब क्यो फिजुल की बात करते हो, आजतक मैने सौ की नोट ही कहां देखी है ?' फिर भी तेरी इच्छा तो बता । इंसमें क्या दिक्कत है ।' तब हंसकर कहा- 'मेरी पत्नी के पास एक भी अच्छी साडी नहीं है,  अतः उस के लिए नयी साडी लाऊंगा । और यदि हजार रु. लगे तो ?' 'तो मैं घर की मरम्मत कराऊंगा ।' औ यदि दस हजार रु. मिले तो ? 'क्या साहब आज कोई मसखरी का पात्र नहीं मिला जो मुझे परेशान करते हो । मैने सपने में भी इतने पैसो का सोचा नहीं है ।' 'अरे भाई ! फिर भी अपनी उम्मीद दिखानें में तुझे क्या एतराज है ?' 'यदि मुझे रु.१००० लगे तो मै कोई छोटा सा धंधा शुरु करुंगा !' 'अच्छा और मान ले कि यदि तुझे लाख रु. ही लग जाय तो ?' मसखरी से तंग आकर मजदूरने अपना जान छुडाने के लिए कह दिया- 'तो रु.५० हजार आपको देने का वादा करता हूं,