આજ નો દિવસ : વિક્રમ સંવત   ૨૦૭૩  ( નેમિસૂરિ સંવત  ૬૮ )  આસો સુદ બીજ શુક્રવાર   Dt: 22-09-2017



જીવન માં જે વાત ભૂખ્યું પેટ અને ખાલી ખિસ્સું શીખવે છે, તે વાત કોઈ શિક્ષક પણ ના શીખવી શકે

                                                   श्री नवकार सूत्र

नमो अरिहंताणं|

नमो सिद्धाणं  |

नमो आयरियाणं|

नमो उवज्झायाणं|

नमो लोएसव्वसाहूणं|

एसो पंचनमुक्कारो, सव्व-पाव-प्पणासणो;

मंगलाणं च सव्वेसिं, पठमं हवइ मंगलं||

गाथार्थ - नवकार

            अरिहंत भगवंतों को नमस्कार हो, सिद्ध भगवंतों को नमस्कार हो, आचार्य भगवंतों को नमस्कार हो, उपाध्याय भगवंतो को नमस्कार हो, लोक में रहे हुए सर्व साधु भगवंतो को नमस्कार हो, इन पांचो को किया हुआ नमस्कार सव पापों का नाश करनेवाला है और सर्व मंगलो में (यह नमस्कार) प्रथम मंगल है...

पंचिंदिय सूत्र

पंचिंदिय-संवरणो, तह नव-विह-बंभचेर-गुत्तिधरो,

चउविह-कसाय-मुक्को, इअ अट्ठारस-गुणेहिं संजुुत्तो..........१

पंच-महव्वय-जुत्तो, पंच-विहायार-पालण-समत्थो,

पंच-समिओ तिगुत्तो, छत्तीस-गुणो गुरु मज्झ...२

गाथार्थ  -

            पांच इंर्द्रियो को वश में रखने वाले, नव प्रकार की ब्रह्मचर्य की गुप्तियों को धारण करनेवाले, चार प्रकार के कषायो से मुक्त-इन अट्ठारह गुणों से युक्त, तथा....१

            पांच महाव्रतो सें युक्त, पांच प्रकार के आचारों का पालन करने में समर्थ, पांच समितियों से युक्त और तीन गुप्तियों से युक्त (इन) छत्तीस गुणोंवाले मेरे गुरु है....२

                            खमासमण सूत्र

इच्छामि खमा-समणो! वंदिउं, जावणिज्जाए

निसीहिआंए, मत्थएण वंदामि ......१

गाथार्थ - खमासमण सूत्र

            हे क्षमावान साधु महाराज! आपको मैं शक्ति के अनुसार पापमय प्रवृत्तियोें को त्याग कर वंदन करना चाहता हूं. मैं मस्तक (आदि पांच अंगो) से वंदन करता हुं......१

इच्छकार सूत्र

            इच्छकार सुह-राइ? सुह-देवसि? सुख-तप? शरीर निराबाध? सुख संजम यात्रा निर्वहो जी? स्वामि! शाता  छो जी? आहार - पानी का लाभ देशो जी...१

 गाथार्थ - इच्छकार सूत्र

            (हे गुरुजी) मैं (पूछना) चाहता हूं. रात्रि में आप सुख पूर्वक रहे हो? (दिन में आप सुख पूर्वक रहे हो?) आपको तप सुख पूर्वक होता है? आपका शरीर पीडा रहित है? आप अपनी संयम यात्रा का सुख पूर्वक निर्वाह करते हो जी? हे स्वामी, आप सुख-शांति में हो? आहार, पानी आदि को ग्रहण कर लाभ देनाजी...१

अब्भूट्ठिओमि सूत्र

इच्छा कारेण संदिसह भगवन् ा अब्भुट्ठिओमि, अब्भिंतर-देवसिमं खामेउं?इच्छं खामेमि देवसिंअं. जं किंचि अपत्तिअं, पर-पत्तिअं; भत्ते, पाणे;

विणए, वेयावच्चे, आलावे, संलावे, उच्चासणे, समासणे; अंतर-भासाए उवरि-भासाए; जं किंचि मज्झ, विणय-परिहीणं, सुहुमं वा, बायरं वा; तुब्भे जाणह, अहं न जाणामि,तस्स मिच्छामि दुक्कडं....१

गाथार्थ - अभ्भुट्ठिओ सूत्र

            हे भगवान! स्वेच्छा से आज्ञा प्रदान करो ा दिन में किये हुए (अपराधों की) क्षमा मांगने के लिये मैं उपस्थित हुआ हूं ा आपकी आज्ञा स्वीकार करता हूं ा दिन में हुए (अपराधों की) मैं क्षमा मांगता हूं, आहार -पानी में, विनय में, वैयावुत्य में, बोलने में, बातचीत करने में, उंचे आसन पर बैठने में, समान आसन पर बैठने पर से, बीच में बोलने से, टीका करने से जो कोइ अप्रीतिकारक, विशेष अप्रितकारक हुआ हो, छोटा या बठा विजय रहित (वर्तन) मुझसु हुआ हो, (जो) आप जानते हो, मैं नहीं जानता हूं. मेरे वे अपराध मिथ्या हो.... १

          सूत्र परिचय

            इस सूत्र में गुरु महाराज के प्रति हुए अविनय के लिए क्षमा मांगी जाती हैा

 

इरियावहिया सूत्र

इच्छा कारेण संदिसह भगवन! इरियावहियं पडिक्कमामि? इच्छं पडिक्कमिउं...१

इरियावहियाए, विराणाए.......२गमणागमणे.....३पाण-क्कमणे, बीय क्कमणे,

हरिय-क्कमणे, औसा उत्तिंगपणग-दग-मट्टि, मक्कडा-संताणा, संकमणे...४

जे मे जीवा विराहिया...५

एगिंदिया, बेइंदिया, तेइंदिया, चउरिंदिया, पंचिंदिया...६

अभिहया, वत्तिया, लेसिया, संघाइया, संघट्टिया, परियाविया, किलामिया, उद्दविया,

ठाणाओ ठाणं संकामिया, जीवियाओ ववरोविया, तस्स मिच्छामि दुक्कडं.......७

गाथार्थ - इरियावहिया सूत्र

          हे भगवन् ा स्वेच्छा से आज्ञा दीजिये ा आने - जाने की क्रिया से लगे पाप का प्रतिक्रमण करुं? आपकी आज्ञा मैं स्वीकार करता हँू ा में प्रतिक्रमण करना चाहता हँू ...... १

मार्ग में चलते चलते समय हुई जीव विराधना का.....२

आते - जाते समय.......३

प्राणियों को दबाने से, बीज को दबाने से, हरी वनस्पति को दबाने से, ओस की बूंद, चींटीयों के बिल, पंच वर्णी काई, भीगी मिट्टी, मकडी के जाले दबाने से....४

मेरे द्वारा जो जीव मुझसे दुःखित हुए हों.....५

एक इंद्रिय वाले, दो इंद्रियवाले, तीन इंद्रियवाले, चार इद्रियवाले, पाँच इद्रियवाले (जीव)....६

पाँव से मारे हों, धूल से ठके हों, भूमि के साथ कुचले गये हों, परस्पर शरीर से टकराये गये हों, थोडा स्पर्श कराया गया हो, कष्ट पहुंचाया गया हो, खेद पहुंचाया गया हो, डराये गये हों, एक स्थान से दूसरे स्थान पर फिराये गफे हों, प्राण रहित किये गये हों, मेरे ये सब दुुष्कृत्य मिथ्या हों.....७

सूत्र परिचय

            इस सूत्र से चलते - फिरते, आते-जाते अपने द्वारा जीव-हसा आदि होने के कारण लगे हुए पापों को नष्ट करने के लिये पूर्व क्रिया रुप मिच्छा मि दुक्कडं

 

तस्स उत्तरी सूत्र

तस्स उत्तरी करणेणं, पायच्छित-करणेणं, विसोही - करणेणं,

विस्सली-करणेणं, पावाणं कम्माणं निग्घा यणट्ठाए, ठामि काउस्सगं...१

गाथार्थ - तस्स उत्तरी सूत्र

             उन (पापों) को फिर से शुद्धि करने के द्वारा, प्रायश्चित करने के द्वारा विशुद्धि करने के द्वारा, शल्य रहित करने के द्वारा, पाप कर्मो का संपूर्ण नाश करने के लिये मैं कायोत्सर्ग करना चाहता हँू ा

शब्दार्थ

          कायोत्सर्ग ः  संकल्प विकल्प रहित होकर मन को धर्म ध्यान में स्थिर रखने के भिये आवश्यक मानसिक प्रवृत्ति के सिवाय सर्व प्रकार की प्रवृत्ति और शारीरिक ममत्व को मन-वचन-काया से त्याग करना ा

सूत्र परिचय

            ईरियावहिया सूत्र  से पापों की सामान्य शुद्धि रुप प्रतिक्रमण करने के बाद भी बचे हुए पापों को नाश करने के लिए (विशेष शुद्धि के लिए) उत्तर क्रिया रुप काउस्सग्ग के पांच हेतु इस सूत्र में बताये है ा                                      

                               अन्नत्थ सूत्र

अन्नत्थ-ऊससिएणं, नीससिएणं, खासिएणं, छीएणं,

जंभाइए, उड्डुएणं, वाय-निसग्गेणं, भमलीए पित्त-मुच्छाए.....१

सुहुमेहिं, अंग-संचालेहिं, सुहुमेहिं खेल-संचालेहिं, सुहुमेहिं दिट्ठिसंचालेहिं.....२

एवमाइएहिं, आगारेहिं, अ-भग्गो अ-विराहिओ, हुज्ज मे काउस्सग्गो.....३

जाव अरिहंताणं भगवंताणं, नमुक्कारेणं न पारेमि...४

ताव कायं ठाणेणं मोणेणं, झाणेणं, अप्पाणं वोसिरार्मि...५

गाथार्थ - अन्नत्थ सूत्र

          जब तक अरिहंत भगवंतो को नमस्कार करने के द्वारा (कायोत्सर्ग) पूर्ण न करुं (गा. ४) तब तक (गा. ५.) श्वास लेने से, श्वास छोडने से, खांसी आने से, छींक आने से, जम्हाई आने से, डकार आने से, अधो वायु निकलने से, चक्कर आने से, पित्त विकार के कारण मूर्च्छा आने से...१

            सूक्ष्म रुप से अंग संचालन से, सूक्ष्म रुप से कफ और वायु के संचालन से, सूक्ष्म रुप से दृृष्टि के संचालन....२

            इत्यादि आगारों से मेरा कायोत्सर्ग अभंग और अविराधित हो..३.. (इंर्सलिये) अपनी काया को स्थिरता पूर्वक, मौन पूर्वक (और) ध्यान पूर्वक त्याग करता हूँ ...४.

                            लोगस्स सूत्र

लोगस्स उज्जोअ-गरे, धम्म-तित्थ-यरे जिणे,

अरिहंते कित्तइस्सं, चउवीसं पि केवली....१

उसभ-मजिअं च वंदे, संभव -मभि णंदणं च सुमइंर् च.

पउम-प्पहं सुपासं, जिणं च चंद-प्पहं वंदे..२

सुविहिं च पुप्फ दंतं, सीअल-सिज्जंस-वासु-पुज्जं च.

विमल-मणंतं च जिणं, धम्मं संतिं च वंदामि...३

कुंथुं अरं च मल्लिं, वंदे मुणि-सुव्वयं नमि-जिणं च,

वंदामि रिट्ठ नेमिं, पासं तह वद्धमाणं च....४

एवं मए अभिथुआ, विहुय-रय-मला पहीण-जर-मरणा.

चउ-वीसं पि जिणवरा, तित्थ-यरा मे पसीयंतु ...५

कित्तिय-वंदिय - महिया, जे ए लोगस्स उत्तमा सिद्धा.

आरुग्ग-बोहि-लाभं, समाहि-वर-मुत्तमं-दिंतु...६

चंदेसु निम्मल-यरा, आइच्चेसु अहियं पयासयरा 

सागर वर गंभीरा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु...७

गाथार्थ - लोगस्स सूत्र

            लोक में प्रकाश करने वाले, धर्मतीर्थ का प्रवर्तन करने वाले, राग-द्वेषादि के विजेता एवं त्रैलोक्य पूज्य चोबीसों केवलियों की में स्तुति करुंगा....१

            श्री ऋषभदेव, श्री अजितनाथ, श्री संभवनाथ, श्री अभिनंदन स्वामी और श्री सुमतिनाथ को में वंदन करता हूँ. श्री पद्मप्रभ स्वामी, श्री सुपार्श्वनाथ और श्री पुष्पदंत, श्री शीतलनाथ, श्री श्रेयांसनाथ, श्री वासुपूज्य स्वामी, श्री विमलनाथ, श्री अनंतनाथ, श्री धर्मनाथ और श्री शांतिनाथ जिनेश्वर को में वंदन करता हूँ....३

            श्री कुंथुनाथ, श्री अरनाथ, श्री मल्लिनाथ स्वामी और श्री नमिनाथ जिनेश्वर  को में वंदन करता हूँ. श्री अरिष्ट नेमि, श्री पार्श्वनाथ और श्री वर्धमान स्वामी को में वंदन करता हूँ.....४

            इस प्रकार मेरे द्वारा स्तुति किये गये, कर्म रुपी मल से रहित , वृद्धावस्था और मृत्यु से मुक्त, तीर्थ के प्रवर्तक चौबीसों  जिनेश्वर मेरे उपर प्रसन्न हो.....५

            जो ये कीर्तन-वंदन -पूजन किये गए है, भोकोत्तम है, सिद्ध है, वे आरोग्य के लिये बोधि लाभ और उत्तम भाव समाधि प्रदान करे......६

            चंद्रों सें अधिक निर्मल, सूर्यो से अधिक प्रकाशवान, श्रेष्ठ सागर से अधिक गंभीर सिद्ध भगवंत प्रदान करे....७

सूत्र परिचय

इस सूत्र में नाम पूर्वक चौबीस तीर्थंकरो की तथा गर्भित रुप में तीनों काल के सर्व तीर्थंकरों की स्तुति की गयी है एवं सम्यग्-दर्शन-ज्ञान-चारित्र रुप  रत्न-त्रयी द्वारा मोक्ष प्राप्ति की पार्थना की गयी है.

                            करेमि भंते

करेमि भंते!  सामाइयं सावज्जं जोगं पच्चकखामि,

जाव नियमं पज्जुवासामि, दुविहं, ति-विहेणं,मणेणं, वायाए, काएणं,

न करेमि, न कारवेमि, तस्स भंते! पडिक्कमामि, निंदामि, गरिहामि, अप्पाणं वोसिरामि....१

गाथार्थ - करेमि भंते

            हे भगवन्! मैं सामायिक करता हूँ जब तक मैं नियम का पालन करता हूँ (तब तक) सावध योग का दो प्रकार से- न कराऊँ न कराऊँ और तीन प्रकार से - मन, वचन और काया से पच्चक्खाण करता हूँ, हे भगवन् ! उनका मैं प्रतिक्रमण करता हूँ, निंदा करताहूँ. निंदा करता हूँ, मैं गर्हा करता हूँ और मैं (पापवाली) आत्मा का त्याग करता हूँ......१          

                             सूत्र परिचय

            इस सूत्र में सामायिक ग्रहण करने का और सावध योग रुप पाप का त्याग करने का पच्चक्खाण है, अर्थात् मन-वचन-काया से कोई भी पाप न करने, न कराने एवं सामायिक के नियम तक समभाव में रहने का बतलाया है.

                     सामाइय-वय-जुत्तो सूत्र

सामाइय-वय-जुत्तो, जाव होइ नियम-संजुत्तो, छिन्नइ असुहं कम्मं, सामाइयं जत्तिआ वारा...१

सामाइयम्मि उ कए, समणो इव सावओ हवइ जम्हा, एएण कारणेणं, बहुओ सामाइयं कुज्जा...२

सामायिक विधि से लिया, विधिए पूर्ण किया, विधिमें जो कोई अविधि हुई हो, उन सबका मन-वचन-काया से मिच्छा मि दुक्कडं...३

दस मन के, दस वचन के, बारह काया के- इन बत्तीस दोषों में से जो कोई दोष लगा हो, उन सबका मन-वचन-काया से मिच्छा मि दुक्कडं....४

                गाथार्थ - सामाइय-वय-जुत्तो सूत्र

            जहाँ तक (सामायिक व्रत धारीका) मन सामायिक व्रत के नियम सें युक्त है और जितनी बार सामायिक करता है, (वहां तक और उतनी बार वह) अशुभ कर्मों का नाश करता है....१

            सामायिक करने पर तो श्रावक श्रमण के समान होता है, इस लिये सामायिक अनेक बार करना चाहिये....२

            सामायिक विधि से लिया, विधि से पूर्ण किया, परन्तु विधि करते समय जो कोई अविधि हूई हो, मन-वचन-काया से मेरे वे सब दुष्कृत्य मिथ्या हो...३

            मन के दस, वचन के दस, और काया के बारह-इन बत्तीस दोषों में से जो कोई दोष लगा हो, मेरे वे दुष्कृत्य मन-वचन-काया से मिथ्या हो.....४

सूत्र परिचय

            इस सूत्र में सामायिक व्रत की महिमा बताई गई है. सामायिक करने वाला श्रावक जब तक सामायिक में रहता है, तब तक वह मुनि तुल्य कहा जाता है. इसलिए पवित्र चारित्र धर्म की आराधना के लिए एवं पुनः पुनः सामायिक करने की भावना को स्थायी बनाने के लिए सामायिक पूर्ण करते समय यह सूत्र बोला जाता है.

                         जग-चिन्तामणि चैत्य-वन्दन

इच्छा-कारेण संदिसह भगवन् ! चैत्य-वन्दन करुं? इच्छं.

जग-चिन्तामणि! जग-नाह! जग-गुरु! जग-रक्खण!

जग-बंधव! जग-सत्थवाह!  जग-भाव-विखक्खण!

अट्ठावय-संठविअ-रुव!  कम्मट्ठ-विणासण!

चउवीसं पि जिणवर! जयंतु अ-प्पडिहय-सासण...१

कम्म-भूमिहिं कम्म-भूमिहिं पठम-संघयणि,

उक्कोसय सत्तरि-सय जिण-वराण विहरंत लब्भइ;

नव-कोडिहिं केवलीण, कोडी-सहस्स नव साहु गम्मइ.

संपइ जिणवर वीस मुणि, बिहुं कोडिहिं वरनाण...२

जयउ सामिय जयउ सामिय रिसह सत्तुंजि,

उज्जिंति पहु-नेमि-जिण, जयउ वीर सच्चउरी-मंडण;

भरु-अच्छहिं मुणि-सुव्वय, महुरि-पास दुह-दुरिअ-खंडण,

अवर-विदिेहि तित्थ-यरा, चिहुं दिसि विदिसि जिं के वि;

तीआणागय संपइय, वंदउं जिण सव्वे वि....३

सत्ता-णवइ सहस्सा, लक्खा छप्पन्न अट्ठ-कोडिओ.

बत्तीस-सय बासियाइं, तिअ-लोए चेइए वंदे....४

पनरस-कोडि - सयाइंं, कोडि बायाल लक्ख अडवन्ना.

छत्तीस-सहस-असीइं, सासय-बिंबाइं पणमामि...५

गाथार्थ - जग-चिन्तामणि चैत्य-वन्दन

            हे भगवन् ! स्वेच्छा से आज्ञा प्रदान करो. (मैं) चैत्यवंदन करुँ? (मैं) आपकी आज्ञा स्वीकार करता हूँ.

            जगत के