આજ નો દિવસ : વિક્રમ સંવત   ૨૦૭૪  ( નેમિસૂરિ સંવત  ૬૯ )  માગશર સુદ બીજ સોમવાર   Dt: 20-11-2017



તલવાર કી કિંમત મ્યાન સે નહિ ધાર સે હોતી હૈ, કપડો કી કિંમત રંગ સે નહિ તાર સે હોતી હૈ, કહી ભી દેખો મહત્વ મૂલકા હોતા હૈ છીલકે કા નહિ, આદમી કી કિંમત પૈસે સે નહિ સદાચાર સે હોતી હૈ…

जगद्गुरु महावीर

विचरण करते-करते हुए  एक बार वे दक्षिण जावालप्रदेश में पहुंचे । वहां से विहार करते हुए  प्रभु श्वेताम्बिका नगरी जा रहे थे । रास्ते में कुछ गोपालकों ने कहा - हैं
देवार्य ! श्वेताम्बरी नगरों की ओर जाने के लिये यह रास्ता सीधा जरुर है, परन्तु इसमें बीच में कनखल नामक तापस का एक सूना आश्रम पडता है, वहां अब एक दृष्टिविष सर्व अपनी बांबी बना कर रहता है । वहाँ पशु-पक्षी, मनुष्य या कोई भी प्राणी सहीसलामत नहीं जा सकते । अतः आप इस मार्ग को छोड कर थोडे से चक्कर वाले इस मार्ग से चले जाएं । कहावत है - जिस सोने के कान कट जाय, उसे पहनने से क्या लाभ ?' भगवान् ने अपने आत्मज्ञान में डुबकी लगा र जाना कि वह  सर्प और कोई नहीं, वहीं पूर्वजन्म का तपस्वी साधु है, जो भिक्षा के लिये जा रहा था कि मार्ग में उसका पैर एक मेंढकी पर पडने से वह मर गई । एक छोटे साधु ने उससे उस दोष की आलोचना करने का कहा और उसे मरी हुई मेंढ़की भी बताई । मगर वह तपस्वी साधु अपनी गलती की आलोचना करने के बदले अन्य लोगों के पैरों से तले कुचल जाने से मरी हुई मेंढ़कियाँ बता कर कहने लगा - 'अरे दुष्ट, क्षुल्लक मुनि ! बता, ये सारी मेंढ़किया क्या मैंने ही मारी है ?' पवित्र बुद्धि वाले, बाल मुनि ने कुछ भी उत्तर नहीं दिया ओर ऐसा माना कि अभी यह महानुभाव भले ही इसे न माने, परन्तु संध्या को तो आलोचना करके प्रायश्चित ले ही लेंगे । मगर शाम को प्रतिक्रमण के समय वह मुनि आलोचना करके प्रायश्चित लिये बिना हो बैठ गये । तब बालमुनि ने विाचर किया कि यह उस मेंढकी की विराधना की बात भूल गये मालूम होते है । इसलिए उस जीवविराधना की बात बाद दिलाने हेतु उसने कहा - 'मुनिवर' ! आप उस मेंढकी की विराधना की आलोचना में प्रायश्चित क्यों नहीं करते ? ऐसा कहते ही यह तपस्वी साधु क्रोध से आग-बबूला हो कर बालमुनि की मारने के लिये दौडा था । उग्रतम क्रोध के कारण यह तपस्वी साधु  स्तम्भ के साथ ऐसा टकराया कि वही खत्म हो गया । साधुत्व की विराधना के कारण वह ज्योतिष्क देवलोक में उत्पन्न हुआ । वहाँ से च्यवन कर यह कनकखल आश्रम में पांच सो तापसों के कुलपति की स्त्री से कौशिक नाम का पुत्र हुआ । वहाँ कौशिक गोत्र वाले और भी बहुत से साधु रहते थे । किन्तु यह कौशिक अति क्रोधि होने से लोगों ने इसका नाम चंडकौशिक रखा था । अपने पिता के मर जाने के बाद चंडकौशिक कुलपति बना । यह कुलपति बनखण्ड की आसक्ति से दिन-रात वन में भ्रमण  करता था । और इस वन से किसी की भी पुष्प, फल, मूल, पत्ते आदि नहीं लेने देता था । नष्ट हुए निरुपयोगी फलादि को भी कोई ग्रहण करता तो उसे लकडी, ढेला, पत्थर, कुल्हाडी, आदि से मारता था । अतः फलादि नहीं मिलने से वे तापस बडे दुःखी होने लगे । जैसे ढेले फेंकने से कोई उड जाते है । वैसे ही वे तापस इस कौशिक के अत्याचार में तंग आकर अलग-अलग दिशाओं में चले गये ।

एक दिन यह चंडकौशिक कांटेदार झाडी लेने के लिये आश्रम से बाहर गया हुआ था । पीछे से श्वेताम्बी नगरी से बहुत से राजकुमारों ने आकर उसके आश्रम और बाग को उजाड दिया । कौशिक कंटिका ले कर वापस लौट रहा था तो ग्वालों ने उसे कहा कि - 'आज तो आपका बगीचा कोई तहस नहस कर रहा है । जल्दी जा कर संभालो !' घी से जैसे आग भडकती है, वैसे ही क्रोध से अत्यन्त भडक कर वह कौशिक तीखी बार वाला कुल्हाडा ले कर उन्हे मारने दौडा । जैसे बाज से डर कर दूसरे पक्षी भाग जाते है, वैसे ही वे राजपुत्र भी चंडकौशिक को कुल्हाडी लिये आते देख नौ-दो-ग्यारह हो गए । तपस्वी बेतहाशा दौडा जा रहा था कि, क्रोध में भान न रहने से अचानक यम के मुखद्दंश एस गहरे कुं ए में गिर पडा । गिरते समय हाथ में पकडी हुई कुल्हाडी मंुह के सामने होने से उसकी धार मस्तक में गड गई और उसका मस्तक फट गया । सच है, कृत कर्मो के फल अवश्य हो भोगने पडते है । वही चंडकौशिक तापस मर कर इस वन में अतिक्रोधी दृष्टिविष सर्प बना हुआ है । वास्तव में तीव्र अनन्तानुबन्धी क्रोध अन्य जन्मों में भी साथ जाता है । लेकिन 'यह अवश्य़ ही बोध प्राप्त
करेगा ।' ऐसा विचार कर विश्व-वत्सल प्रभु अपने कष्ट को कष्ट न समझ कर उस सर्प की भव-भ्रमण पीडा मिटाने हेतु उसी मार्ग से चले । वह जंगल मनुष्यों के पैरों का संचार न होने से उबडखाबड और दौरान हो गया था । वहाँ की छोटी-सी नदी का पानी पिया न जाने से प्रवाहरहित रेतीला व गन्दला हो गया था । वहां के पेड पौधे ठूंठ बन गये थे, उनके पत्ते सूख गये थे। पैडों पर जगह-जगह दीमकों ने अपने टीले बना डाले थे । झोंपडिया उजड गयी थी । विश्ववत्सल प्रभु ने  इस दौरान जंगल में प्रवेश किया । और यक्ष के जीर्णशीर्ण मन्दिर के मंडप में वे नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि टिका कर कार्योत्सर्ग (ध्यान) में खडे हो गये । अहंकारी चंडकौशिक सर्प कालरात्रि की तरह जीभ लपलपाता हुआ अपनी बांबी से निकला । वह बन में घूमता हुआ रेती में संक्रमण होती हुई अपने शरीर की रेखा से मानों अपनी आज्ञा  को लेख लिख रहा था । ज्यों ही उसने महाबली प्रभु को देखा, त्यों ही, अपने अहं को चुनौती समझ कर सोचने लगा  - "यह कौन ढूंढ-स निःशंक को कर मुझे जताए बिना ही मेरी अवज्ञा करके ठीठ बन कर खडा है ? इसने इस जंगल में घुसने का साहस ही कैसे किया ? अतः अभी इसे जला कर भस्म करता हूं ।" इस प्रकार क्रोध से जलते हुए उस सर्प ने फन ऊँचा किया । अपने मुंह से विषज्वालाएं उगलता हुआ और वृक्षों की जलाती हुई दृष्टि से भयंकर फुफकार करता हुआ प्रभु को एक टक दृष्टि से देखने लगा । आकाश से पर्वत पर गिरते हुए दुर्दशनीय उल्कापात के समान उसकी जाजवल्यमान दृष्टि- ज्वालाएँ भगवान के शरीर पर पडी परन्त जैसे महावायु, मेरुपर्वत को चलायमान करने में समर्थ नहीं हो सकती, वैसे ही महाप्रभावशाली प्रभु का वह कुछ भी नुकसान नहीं कर सका । "अरे ! अभी तक यह काष्ठ की तरह जला क्यों नहीं ?" यह सोच कर क्रोध से अधिक तप्त हो कर वह सूर्य की ओर बार-बार दृष्टि करके फिर ज्वालाएँ छोडने लगा । परन्तु वे ज्वालाएँ भी प्रभु के लिये जलधारा के समान बन गई । अतः उस निर्दयी सर्प ने प्रभु के चरणकमल पर दंश मारा और अपना जहर उगला । इस प्रकार कई बार लगातार  डंस कर वह वहाँ से हटता जाता था । यह सोचकर कि कहीं यह मेरे जहर से मूर्च्छा खा कर मुझ पर ही गिर कर मुझे दबा न दे । फिर भी प्रभु पर उसके जहर का जरा भी असर नहीं हुआ । उनके अंगूठे से दूध की धारा के समान उज्जवल सुगन्धित रक्त बहने लगा । उसके बाद वह प्रभु के सामने आश्चर्यपूर्वक टकटकी लगा कर देखने लगा और सौचने  लगा - 'अरे यह कौन है, जिस पर मेरे विष का कोई प्रभाव न हुआ ? बाद में जगन्नाथ महावीर के अद्भुत रुप को देख कर उसकी कान्ति और सौम्यता से उसकी आंखे सहसा चकाचौंध हो गई' । सर्प को शान्त जान कर भगवान् ने उसने कहा - 'चंड कौशिक । अब भी बोध प्राप्त कर, समझ जा, जागृत हो जा, मोह मत कर ।," भगवान् के ये वचन सुन कर मन ही मन उन पर उहापोह (चिन्तन-मनन) करते करते उसे पूर्व जन्म का ज्ञान- जाति- स्मरण हो गया  । अब चण्डकौशिक कषायों सें मुक्त व शान्त हो चुका था ।  उसने भगवान् की तीन बार प्रदक्षिणा दे कर मन से अनशन अंगीकार कर लिया । महाप्रभु ने पापकर्म से रहित और प्रशम रस में तल्लीन उस महासर्प द्वारा स्वीकृत अनशन को देख कर उसे उपदेश दिया  - "वत्स ! अब तु कहीं पर भी मत जाना, तेरी आँखो में जहर भरा हुआ है ।"यह सुन कर  वह बांबी में मुंह डाल कर समतारुप अमृत का पान करने लगा । उस पर अनुकंपावश भगवान भी वहीं रुके रहे । सच है - महापुरुषों की प्रवृत्तिया दूसरों के उपकार के लिये होती है । "ऐसी स्थिति में भगवान को देखकर आश्चर्य से आंखे फाडते हुए ग्वाले एकदम वहां दौडे हुए आये । वृक्षों की ओट में छिप कर वे हाथ में जो पत्थर व ढेले आदि लाये थे, उनसे महात्मतुल्य बने हुए सर्प पर निर्दयतापूर्वक प्रहार करने लगे । किन्तु उसे अडोल और स्थिर देख कर उन्हें विश्वास हो गया कि यह शान्त है; तब उसके पास जा कर उसके शरीर को लकडी छुआ कर कुरेदने लगे; फिर भी वह स्थिर रहा । ग्वालों ने यह बात गांव के लोगों से बताई तो वे लोग भगवान् की और उसे महासर्प की पूजा करने लगे । उस मार्ग से घी बेचने जाती हुई ग्वालिने नागराज के शरीर पर घी और  मक्खन चुपडने लगी उसकी गंध से तीक्ष्णदंशी  चींटियों ने काट काट कर उसके शरीर पर छलनी के समान बना दिया । 'मेरे क्रूर कर्मो की तुलना में यह वेदना तो कुछ भी नहीं है;' इस तरह अपनी आत्मा को समझाता हुआ वह महानुभाव सर्प उस अतिदुःसह वेदना  को सहन करने लगा । ये बेचारी निर्बल चीटियाँ कहीं मेरे इधर-उधर हिलने-डुलने से दब कर मर न जाये । इस विचार से वह महासर्प अपने अंग को जब जरा भी चलायमान नहीं करता था । भगवान् को कृपामयी सुधावृष्टि से सिंचित व स्थिरचित्त यह सर्प पन्द्रहवे दिन मर कर सहस्त्रार नामक वैमानिक देवलोक ने गया ।

इस प्रकार अपने पर विविध उपसर्ग करने वालें दृष्टिविष फणिधर भक्ति करने वाले इन्द्र, इन दोनों पर चरम तीर्थकर, तीन जगत् के अद्वितीय बन्धु श्री महावीर परमात्मा समानभाव रखते थे ।

कृतापराधेऽपि जने, कृपामन्थरतारयोः ।

ईषद्-वाष्पाद्रयोर्भंद्रं, श्रीवीरजिननेत्रयोः ।। ३ ।।

अर्थ

अपराध करने वाले जीवों पर भी दया से पूर्ण और करुणाश्रु से आर्द्र (गीले) श्रीमहावीरप्रभु के नेत्रों का कल्याण हो ।

व्याख्या

भगवान् महावीर की आंखे अपराध करने वाले संगमदेव आदि पर भी अगाथ करुणा से परिपूर्ण थीं । अंतर में महान करुणा से आप्लावित्त उनकी आंखें, सदैव अश्रुजल से भीगी रहती थी । भगवान महावीर की ऐसी सुधामयी आंखो का कल्याण हो । इसका आशय यह है कि ऐसे सामर्थ्ययोग से युक्त प्रभु को हमारा वन्दन-नमस्कार हो । उक्त  बाद की पुष्टि के लिए महावीर प्रभु के जीवन का एक वृतान्त दे रहें है ।

भगवान महावीर की महाकरुणा

एक गांव से दूसरे गांव और एक शहर से दूसरे शहर-विहार करते हुए भगवान महावीर एक बार मलेच्छ-कुलों की वस्ती वाली दृढ़भूमि में पधारे । अष्टमभक्त-प्रत्याख्यान (तेले) की तपस्या करके वे पेढ़ालगांव के निकट पेढ़ाल नामक वन  में पोलाश नाम के मन्दिर में प्रवेश कर एक प्रासुक शिलातल पर आरुढ हो कर घुटनों तक हाथ लम्बे करके, शरीर को झुका कर अपने स्थिर अंतःकरण से आंख बंद किये बिना एक रात्रि- सम्बन्धी महाप्रतिमा धारण करके ध्यानस्थ खडे रहे । उस समय सौधर्म सभा में चोरासी हजार सामानिक देवों से परिवृृत, तैतीस त्रायस्त्रिंश, तीन पारिपाष, चार लोकपाल, असंख्य. प्रकीर्णक देव तथा अपने शरीर पर चारों ओर से बख्तर और हथियार बांधे, चौरासी हजार अंगरक्षक देव-सेनाओं से परिवृत, सात सेनापति, अभियोगिक, किल्बिषिक आदि देव-देवियों तथा तीन प्रकार के वाद्य आदि से सुसज्जित हो कर विनोदपूर्ण समय बिताते हुए, दक्षिण लोकार्ध के रक्षक शक्र नाम के देवेन्द्र ने सिंहासन पर बैठे-बैठे अवधिज्ञान से भगवान् को उक्त स्थित में जाना । वे तुरन्त खडे, हुए और पादुका त्याग कर उतरासंग धारण कर, दाहिना पैर भूमि पर रख कर और बांया पैर जरा ऊंचा करके भूतल पर मस्तक झुका कर शक्रस्तव (नमुत्थुणं)  से भगवान की स्तुति करने लगे । इन्द्र का अंग-अंग पुलकित हो रहा था  । उसन  खडे होकर सारी सभा को सम्बोधित करते हुए कहा - 'सौधर्म देव लोकवासी उत्तम देवो । तुम्हें भगवान् महावीर की अद्भूत महिमा सुनाता हूं, सुनो । पांच समिति के धारक, तीन गुप्ति से पवित्र,  क्रोध-माना-माया और लोभ के वश करने वाले, आश्रवरहित, द्रव्य-क्षेत्रकाल और भाव में निर्ममत्वी, वृक्ष या एक पुद्गल पर दृष्टि एकाग्र  करके कायोत्सर्ग (ध्यान)में स्थिर महावीर स्वामी को देव दानव, यक्ष, राक्षस, नागकुमार, मनुष्य या तीन लोक में से कोई भी ध्यान से विचलित करने में समर्थ नहीं है ।'

इन्द्र के वचन सुन कर एक अभव्य, गाढ़मिथ्यात्वी संगम नामक इन्द्र का सामानिक देव भोंहे तान कर, विकराल आंखे बना कर, क्रोध से ओठ चंबा कर, आंखे लाल करते हुए बोला - 'हे देवेन्द्र ! एक मनुष्य  का इतना बढ़चढ़ कर गुणगान करके उसे ऊंचे शिखर पर चढ़ाना, सत्यासत्य के विवाद में आपकी स्वच्छंदतायुक्त प्रभुता का परिणाम है । यह असंभव है कि मृत्युलोक के व्यक्ति को देव भी ध्यान से चलायमान नहीं कर सकते । अतः स्वामी का ऐसा उडत वचन हृदय में कैसे धारण किया जा सकता है ? कदाचित् धारण भी कर लिया गया हो, फिर भी उसे सबके सामने प्रगट कैसे किया जा सकता है ? गगनचुम्बी उच्चशिखरयुक्त एवं पातालमूलगामी जिस मेरुपर्वत को देव दो हाथों से ढेले की तरह उठा कर फैक सकता है, पर्वतो सहित समग्र पृथ्वी को डुबा सकता है, महासमुद्र को छोटी-सी नदी के समान बना सकता है, अनेक पर्वतो से बोझिल विशाल पृथ्वी को अनायास ही अपने भुजदंड से उठा सकता है, ऐसी असाधारण ऋद्धि महापराक्रम और इच्छामात्र से कार्यसिद्धि की उपलब्धि से युक्त देवों के सामने मनुष्य क्या चीज है ?  में अभी इन्द्र द्वारा प्रशंसित व्यक्ति के पास जा कर उसे ध्यान से विचलित करता हूँ । यों कह कर हाथ से पृथ्वी को ठोककर यह देव सभामंडप में आ खडा हुआ । इन्द्र ने उसे बहुतेरा समझाया कि श्रीअरिहंतदेव दूसरों से सहायता लिए बिना स्वयं अखंड तप करते है" किन्तु जब वह रंचमात्र भी नहीं समझा, तब इन्द्र ने उसे दुर्बुद्धिदेव की उपेक्षा की । दुर्बुद्धिदेव हठाग्रही होकर भगवान् को विचलित करने के लिए वहां से चला। उसके गमन से प्रचंड वायुवेग के कारण बादल भी बिखरने लगे । अपनी रौद्र आकृति के कारण वह महाभयंकर दिखने लगा । उसके भय से अप्सराएँ भी मार्ग से हट गई । विशाल वक्षः स्थल से टक्कर मार कर उसने मानो ग्रहमंडल को एकत्रिक कर दिये थे ।

इस प्रकार वह अधम देव वहां आया, वहा भगवान् प्रतिमा धारण कर ध्यानस्थ खडे थे । अकारण जगदबन्धु श्रीवीरप्रभु को इस प्रकार के शान्त देख कर उसे अधिक ईर्ष्या हुई । सर्वप्रथम उस दुष्ट देव ने जगद्गुरु  महावीर पर अपरिमित धूल की वर्षा की &a